लखनऊ : कभी पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने वाली बसपा का भाजपा में मोदी युग आने के बाद से ही लगातार ग्राफ गिरता रहा। इसे देखकर लोग अब यह मान चुके थे कि बसपा बीमार हो चुकी है और यह धीरे-धीरे खत्म होने की कगार पर है। दरअसल नौ साल के भीतर बसपा ने कोई बड़ा कार्यक्रम किया भी नहीं था। पिछले विधानसभा चुनाव में बसपा मात्र एक सीट ही जीत पायी थी, जबकि कांग्रेस ने दो सीट जीते थे। हालांकि बसपा ने कुल 1,18,73,137 मत पाकर कुल पड़े मत का 12.88 प्रतिशत वोट पाये थे। वहीं कांग्रेस को मात्र 2.33 प्रतिशत मत मिले थे।
इन सबके बावजूद गुरुवार को बसपा का कार्यक्रम देखकर राजनीतिक दलों के कान खड़े कर दिये। बसपा यह बताने में कायम रही कि अभी उसके समर्थकों की कमी नहीं आयी है। वह आज भी एक वर्ग के दिल में उतनी ही जगह रखती है, जितना 2012 में रखती थी। रैली में मायावती का नया अवतार भी दिखा। पहले जहां वे सिर्फ लिखित रूप से कागज को पढ़ती थी, वहीं गुरुवार के कार्यक्रम में वे पर्ची का बहुत कम सहारा लीं और उनके भाषणों में काफी जोश दिखा। मंच पर मुस्लिम धर्म के साथ ही, सवर्ण, ओबीसी और दलित समाज के नेताओं को मिली जगह से यह भी संकेत दे दिया कि इस बार भी सर्व समाज का नारा बसपा बुलंद करने जा रही है।
बसपा 2027 में नहीं करेगी किसी से गठबंधन
मायावती ने आज साफ कर दिया कि वे किसी से गठबंधन करने नहीं जा रही हैं। वे 2027 का यूपी विधानसभा चुनाव अकेले लड़ेंगी। उन्होंने कहा कि गठबंधन में चुनाव लड़ने पर बसपा को कभी विशेष फायदा नहीं हुआ। हमारे वोट दूसरे दलों को ट्रांसफर हो जाते हैं पर फारवर्ड वोट कभी बसपा को नहीं मिलते। 2012 में हमने अकेले लड़ा तो अपने दम पर यूपी में सरकार बनाने में सफलता हासिल की थी।
मायावती ने कहा, यह संख्या दिहाड़ी देकर नहीं लायी गयी है
मायावती ने भारी संख्या में पहुंचे कार्यकर्ताओं को देखकर गदगद भाव से कहा कि ये लाखों-लाखों की संख्या में आने वाले लोगों को दूसरी पार्टियों की तरह मजदूरी देकर दिहाड़ी पर नहीं लाया गया है। बल्कि ये लोग अपने खून पसीने की कमाई के पैसों से ही खुद चलकर आज के अपने 9 अक्टूबर के प्रोग्राम में मुझे सुनने के लिए आए हैं। बसपा ने रैली में उमड़ी भीड़ देखकर मायावती ने कहा, “भीड़ के मामले में आज अपने खुद के भी अपने पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए है।
कभी बसपा की गूंज पूरे भारत में सुनाई पड़ती थी।
कभी समय था राष्ट्रीय राजनीति में बहुजन समाज पार्टी की गूंज दूर-दूर तक सुनाई देती थी, लेकिन धीरे-धीरे वह गायब सी हो गयी। समय के साथ पार्टी का प्रभाव धीरे-धीरे सिमटता गया। 2007 में मायावती ने सर्वसमाज का नारा दिया था और दलित समाज के साथ ही ब्राह्मण और मुस्लिम समाज ने भी खुलकर समर्थन किया। नतीजा यह था कि 206 सीटों पर जीतकर बसपा ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनायी। पिछले 2002 के चुनाव की अपेक्षा अप्रत्याशित रूप से 108 सीटें ज्यादा बसपा ने जीते थे।
2007 में सर्वसमाज का नारा, बसपा के लिए स्वर्ण काल
इसको कुल मत 15,872,561 मत यानि पड़े मत का 30.43 प्रतिशत मिला था। प्रतिशत में पिछले चुनाव की अपेक्षा 7.37 प्रतिशत ज्यादा मत मिले थे। यही बसपा का स्वर्ण काल था। भाजपा सिर्फ 51 सीट ही जीत पायी थी और 2002 की चुनाव की अपेक्षा इसको 37 सीट कम मिले थे। वहीं 2002 में सरकार बनाने वाली सपा 143 सीटों से लुढ़ककर 97 पर पहुंच गयी थी, लेकिन इस स्वर्ण काल को बसपा संभाल नहीं पायी, धीरे-धीरे मायावती ने अपने प्रमुख चेहरों को निकाल दिया या तो वे छोड़कर चले गये।
2012 में लुढ़क गयी बसपा, सपा ने फिर बनायी सरकार
2012 के चुनाव में बसपा के अप्रत्याशित रूप से 126 सीटों की कमी आयी और वह 80 सीटों पर ही जीत पायी, जबकि सपा ने 224 सीटें जीतकर सरकार बनायी। बसपा को 2012 में कुल 19,647,303 मत मिले थे, जो कुल पड़े मत का 25.91 प्रतिशत था यानि पिछले चुनाव की अपेक्षा इसके मत प्रतिशत में 4.52 प्रतिशत की कमी आयी।
2017 में भाजपा की आंधी में उड़ गयी हाथी, मिले मात्र 19 सीट
2014 में मोदी युग आ चुका था और 2017 के विधानसभा चुनाव में कोई अनुमान नहीं लगा पा रहा था कि उप्र में भाजपा भी सरकार बना सकती है, लेकिन हुआ यही और भाजपा की सीटों में 265 सीटों की वृद्धि हुई और 312 सीटें जीतकर भाजपा ने सरकार बनायी। भाजपा को 39.67 प्रतिशत मत मिले थे। वहीं बसपा मात्र 19 सीटों पर ही जीत पायी। बसपा को कुल पड़े मत का 19,281,340 मत मिले थे, जो कुल पड़े मत का 22.23 प्रतिशत था। पिछले चुनाव की अपेक्षा 3.68 प्रतिशत मतों की कमी आयी। पिछले चुनाव में तो बसपा सिर्फ एक सीट तक सिमट गयी।
पिछले चुनाव के बाद से समर्थकों का उठ गया भरोसा
इसके बाद समर्थकों को भी यह लगने लगा कि बसपा अब कभी उठ नहीं पाएगी। मायावती भी अब उतना सक्रिय नहीं रह गयी थीं, लेकिन गुरुवार को बसपा के हुए कार्यक्रम ने बसपा नेताओं में जोश भर दिया है। पार्टी में भी नई जान आ गयी। कार्यकर्ता भी काफी उत्साहित दिखे। गुरुवार को लखनऊ में हुई मायावती की रैली में उमड़ी भारी भीड़ ने न सिर्फ पार्टी को नई ऊर्जा दी, बल्कि मायावती के आत्मविश्वास को भी फिर से जगा दिया है। यह भीड़ बताती है कि बसपा का जादू कायम है। इस रैली ने बता दिया कि दलित समाज के बीच आज भी मायावती बड़ी नेता हैं।
मंच से दिया संकेत, मायावती के बाद आकाश ही संभालेंगे गद्दी
मायावती ने मंच से भतीजे आकाश आनंद की कई बार तारीफ की। उन्होंने कहा कि आकाश एक बार फिर पार्टी मूवमेंट से जुड़ चुके हैं, यह शुभ संकेत है। जिस तरह कांशीराम जी ने मुझे आगे बढ़ाया, उसी तरह मैंने आकाश आनंद को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया है। उन्होंने कहा कि मुझे विश्वास है और अपील है कि आप सभी मेरी तरह आकाश का भी हर हाल में साथ देंगे।



