नई दिल्ली: हम सभी ने कभी न कभी बदबूदार जूतों की शर्मिंदगी झेली है। लेकिन दो भारतीय शोधकर्ताओं, विकास कुमार और सार्थक मित्तल ने इस आम समस्या को गंभीरता से लिया और विज्ञान की मदद से उसका समाधान खोज निकाला। हॉस्टल में पसीने से भरे जूतों की बदबू से परेशान होकर उन्होंने छात्रों से सर्वे किया। नतीजा सब परेशान थे लेकिन समाधान किसी को नहीं पता था। घरेलू उपाय नाकाम रहे, तब जाकर विज्ञान काम आया।
क्यों मिला पुरस्कार
उन्होंने पता लगाया कि दुर्गंध का कारण एक खास बैक्टीरिया है, और UV-C लाइट उसे मार सकती है। बस फिर क्या था उन्होंने बनाया एक शू-रैक जो जूतों को साफ़ भी करे और स्टोर भी। इस इनोवेशन को अमेरिका के इग नोबेल प्राइज़ से सम्मान मिला, जो मज़ेदार पर असाधारण खोजों को सराहता है। यह पुरस्कार किसी रिसर्च की गंभीरता नहीं, उसकी रचनात्मकता को मनाता है। इस रिसर्च ने साबित किया कि विज्ञान केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी को बेहतर बनाने का ज़रिया है। और कभी-कभी, बदबूदार जूते भी प्रेरणा बन सकते हैं।
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आइए जानते हैं इग नोबेल पुरस्कार है क्या?
IG नोबेल पुरस्कार की स्थापना 1991 में विज्ञान हास्य पत्रिका एनल्स ऑफ़ द इम्प्रोबेबल द्वारा की गई थी। इस पुरस्कार का उद्देश्य ऐसे शोध को पुरस्कृत करना है जो सुनने में भले ही अजीब लगे, लेकिन मनोविज्ञान और जीव विज्ञान जैसे विभिन्न विषयों से जुड़े मुद्दों पर प्रकाश डालता हो। इससे पहले, भारतीय वैज्ञानिकों को नाक खुजलाने की आदत से लेकर हाथी के पृष्ठीय क्षेत्रफल की गणना तक, जैसे शोध के लिए पुरस्कार मिल चुके हैं। यह भारत का 22वाँ IG नोबेल है। इस पुरस्कार को गंभीर नोबेल पुरस्कार का एक हास्य संस्करण माना जाता है। इसका उद्देश्य पहले लोगों को हँसाना और फिर उन्हें सोचने पर मजबूर करना है।



