नई दिल्ली: बिहार में जब से गठबंधन की राजनीति शुरू हुई है, उसके बाद सियासी समीकरण इस तरह से बदले हैं कि सहयोगी दलों की वजह से वोट बढ़ने के बावजूद सीटों की संख्या में कमी आ जाती है। इसके उलट कई बार ऐसा भी होता है कि भले ही वोट कम हो जाएं लेकिन सीटों की संख्या बढ़ जाती है।
ऐसा किसी एक नहीं बल्कि कई राजनीतिक दलों के साथ हुआ है। 2010 के विधानसभा चुनाव में आरजेडी वोट प्रतिशत के मामले में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी थी। उसे लगभग 19 प्रतिशत वोट मिले लेकिन उसके 22 उम्मीदवार ही जीत सके। लेकिन 2015 में आरजेडी के वोट में लगभग आधा फीसदी की कमी आ गई। लेकिन उसके 80 उम्मीदवार जीते। इसकी वजह ये थी कि 2015 में आरजेडी और काग्रेस के साथ जेडीयू भी एक ही गठबंधन में थे। 2020 के चुनाव में हालात फिर बदल गए। इस बार महागठबंधन में काग्रेस और आरजेडी थे। इस बार आरजेडी के वोट में खासा उछाल आया। लगभग पांच फीसदी वोट बढ़ गए लेकिन सीटें 75 ही रह गईं।
उधर बीजेपी के साथ भी यही हालत रही है। 2010 में उसे 17 फीसदी से कम वोट मिले थे लेकिन उसके 91 उम्मीदवारों ने बाजी मारी। 2015 में उसके वोट बढ़ गए लेकिन उसके जीतने वाले उम्मीदवार महज 53 थे। पिछली बार इसका उलटा हुआ। वोट कम हो गए लेकिन विधानसभा में पहुंचने वाले उसके सदस्यों की तादाद 74 हो गई ।
चुनावी विश्लेषकों का मानना है कि ये गठबंधन में पर्टियों के जुड़ने की वजह से होता है। दरअसल, अलग अलग गठबंधनों में सीटों का बंटवारा अलग अलग तरीके से होता है। साफ है कि जहां दो बड़ी पार्टियां एक ही गठबंधन में होती हैं तो उनकी सीटों की सख्या कम हो जाती है,क्योंकि गठबंधन का दूसरा सहयोगी दल भी मजबूत होता है और वह अधिक सीटें लेता है।
जेडीयू की वजह से ही बार बार ये समीकरण बदले। 2015 में जेडीयू, आरजेडी के साथ महागठबंधन में चुनाव लड़ा तो उसकी लड़ी जाने वाली सीटें कम हो गईं। यही हाल बीजेपी का था। 2015 में जेडीयू साथ न होने की वजह से बीजेपी के साथ एलजेपी, आरएलएसपी और हम पार्टी ही थी। ऐसे में बीजेपी के हिस्से में अधिक सीटें आयीं यानी 157 सीटें। उधर 2015 में आरजेडी, जेडीयू और काग्रेस ने चुनाव लड़ा तो आरजेडी के हिस्से में सिर्फ 101 सीटें ही आयीं। लेकिन उसे सीट जीतने के मामले में फायदा हुआ।



