नई दिल्ली। एक ऐसा संघ जो विश्व में ख्याति लब्ध हो, जहां एक करोड़ से अधिक स्वयं सेवक हों, फिर भी उसका रजिस्ट्रेशन न हो। एक ऐसा संगठन जिसकी कोई सदस्यता शुल्क न हो। सदस्यता की रसीद न कटे। फिर भी एक-दूसरे की भाषा से ही आपस में स्वयं सेवक होने की प्रमाणिकता देते हों, जिसके शीर्षस्थ का चुनाव न होता हो, जो शीर्षस्थ यानि सरसंघचालक है, वहीं अपने उत्तराधिकारी की घोषणा कर दे और उसे सब मान लें। यह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में ही संभव हो सकता है। अन्यत्र कहीं ऐसा उदाहरण देखने को नहीं मिलता।
हिंदूवादी व राष्ट्र प्रथम का विचार रखने वाला स्वयं सेवक संघ विजयादशमी के दिन सौ साल पूरे करने जा रहा है। इस सौ साल में कई बदलाव भी हुए, लेकिन मूल राष्ट्रवादिता हमेशा बना रहा। विचारों से कोई समझौता नहीं हुआ, उसमें निखार अवश्य आया है। यह भी जानने योग्य है कि संघ कभी किसी स्वयं सेवक को बुजुर्ग नहीं मानता। इस कारण आमतौर पर चाचा शब्द का नहीं प्रयोग होता है। यहां एक दूसरे को संबोधन के लिए भाई साहब ही प्रयोग किया जाता है। हकीकत में भी संघ सौ साल में भी बुजुर्ग नहीं हुआ है। अभी तो वह तरूण दिखता है। लगातार प्रगति की ओर बढ़ रहा है। यह नागपुर से निकलकर आज 65 से अधिक देशों तक पहुंच चुका है। आइए जानते हैं संघ के बारे में……..।
स्थापना और नामकरण
- बाल गंगाधर तिलक के विचारों से प्रेरणा।
- -प्रथम सरसंघचालक- डा. केशव बलिराम हेडगेवार थे ।
- -उद्देश्य- हिंदू हितों की रक्षा की रक्षा करना।
- -संस्थापक सदस्य- डा. एलवी परांजपे, बाल शिवराम मुंजे व बीएस मुंजे।
- -स्थापना- 27 सितंबर 1925 (विजयादशमी का दिन) को नागपुर में।
- विजयादशमी को ही संघ अपना स्थापना दिवस मनाया जाता है।
- नामकरण- प्रथम सरसंघचालक डा. केशवराव बलिराम हेडगेवार ने ही किया। – शब्दों का मतलब- राष्ट्रीय शब्द का उपयोग कर राष्ट्र के प्रति समर्पण और प्रतिबद्धता। स्वयं सेवक शब्द स्वयंसेवी भावना को दर्शाता है। संघ शब्द एकता का बोधक है।

संगठनात्मक ढांचा
सबसे छोटी इकाई- शाखा होती है। यहीं से स्वयं सेवक तैयार होते हैं। शाखा के प्रमुख रूप से तीन पदाधिकारी होते हैं। शाखा कार्यवाह शाखा का सबसे बड़ा पद होता है। शाखा संचालक स्थानीय शाखा का नेतृत्व करता है। वहीं मुख्य शिक्षक शाखा में दैनिक कार्यों को सुचारू रूप से चलाने में मदद करता है।
पूर्णकालिक
इसी शाखा से वैचारिक रूप से परिपूर्ण होकर कुछ लोग पूर्णकालिक हो जाते हैं यानि अपना पूरा समय संघ के नाम समर्पित कर देते हैं। वहीं दूसरी ओर कुछ लोग विचारों से ओतप्रोत रहते हुए भी घर गृहस्थी में लगे रहते हैं। जो घर गृहस्थी में लगकर भी समय देते हैं। उन्हें संघ अपनी विभिन्न वैचारिक संगठनों में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष आदि दायित्व देकर सक्रिय बनाता है, लेकिन संघ में अध्यक्ष व उपाध्यक्ष जैसा कोई पद नहीं होता।
संघ के 45 प्रांत
दूसरी ओर संघ में पूर्णकालिक स्वयं सेवक प्रचारक के तौर पर काम करते हैं। प्रचारक अपने गृह जनपद को छोड़कर दूर-दूर तक जहां पर नियुक्ति हो वहां जाते हैं। वहां संघ कार्यालय ही इनका ठौर होता है। संघ की दृष्टि से पूरे राष्ट्र को 45 प्रांतों में बांटा गया है। प्रांत से ऊपर क्षेत्र होता है, यह 11 क्षेत्र हैं। इसके ऊपर केंद्र होता है .

आइए समझते हैं संघ के पदाधिकारियों का क्रम
संघ के पदाधिकारियों को दो वर्गों में बांट सकतें हैं। 1- केंद्रीय नेतृत्व जो पूरे संगठन की देखरेख करता है। 2- स्थानीय स्तर के पदाधिकारी जो जमीनी स्तर पर गतिविधियों का प्रबंधन करते हैं।
आरएसएस का सर्वोच्च पद सरसंघचालक का होता है। वर्तमान में मोहन भागवत आरएसएस प्रमुख हैं। सरसंघचालक को पूर्ववर्ती सरसंघचालक मनोनीत करते हैं और ये आजीवन इस पद पर रहते हैं। सरसंघचालक आरएसएस के मार्गदर्शक होते हैं। संघ की सारी शक्ति सरकार्यवाह के पास होती है। हालांकि, इसे महासचिव माना जाता है। उन्हें अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा (ABPS) के सदस्यों द्वारा तीन वर्ष के लिए चुना जाता है, जो संघ की प्रतिनिधि निकाय है।
इसके बाद सह कार्यवाह के पांच पद होते हैं, जिसे संयुक्त महासचिव कह सकते हैं। ये लोग सरसंघचालक की सहायता करते हैं। संघचालक, कार्यवाह और प्रचारक के बाद छह कार्य विभाग के प्रमुख होते हैं।
1- शारीरिक , 2-बौद्धिक प्रमुख, 3- व्यवस्था 4- सेवा प्रमुख, 5- संपर्क 6 प्रचार
इन सभी प्रमुखों के साथ एक-दो तीन जैस जरूरत हो सह-प्रमुख भी होता है।
स्थानीय स्तर के पदाधिकारी
जमीनी स्तर पर गतिविधियों का प्रबंधन करते हैं। क्षेत्र संघचालक: एक क्षेत्र का नेतृत्व करता है। क्षेत्र के अंतर्गत प्रांत आते हैं और प्रांत संघचालक: एक राज्य का नेतृत्व करता है। जिला संघचालक: एक जिले का नेतृत्व करता है। शाखा संघचालक: स्थानीय शाखा का नेतृत्व करता है, जो आरएसएस की सबसे बुनियादी इकाई है।
क्षेत्र से लेकर जिला स्तर तक संघचालक की सहायता व अन्य गतिविधियों को अंजाम देने के लिए एक कार्यवाह होता है। संघचालक जहां अपने कार्यक्षेत्र का नेतृत्व करता है, वहीं दैनिक कार्यों को करने की पूरी जिम्मेदारी कार्यवाह की होती है। शाखाओं का आयोजन, स्वयंसेवकों की गतिविधियों का समन्वय और अन्य कार्यों का प्रबंधन कार्यवाह की जिम्मेदारी होती है। अपने से ऊपर के पदाधिकारियों के साथ संपर्क बनाये रखने, नीचे के लोगों के समन्वय की पूरी जिम्मेदारी कार्यवाह संपन्न करता है। इनका पदनाम क्रमश: जिला कार्यवाह, विभाग कार्यवाह, प्रांत कार्यवाह, क्षेत्र कार्यवाह होता है।
इसके बाद प्रचार प्रमुख, शारिकरिक शिक्षक प्रमुख, बौद्धिक शिक्षक प्रमुख, व्यवस्था प्रमुख, सेवा शिक्षण प्रमुख, संपर्क प्रमुख होते हैं। इन सभी पदों पर पूर्णकालिक स्वयं सेवक ही नियुक्त किये जाते हैं और ये जिला से लेकर क्षेत्र तक में नियुक्त होते हैं।
अतिरिक्त भूमिकाएं
मुख्य शिक्षक: शाखा में मुख्य प्रशिक्षक। कार्यवाह: स्वयंसेवक जो शाखा स्तर पर विभिन्न कार्यों को संभालते हैं। आरएसएस में कई विचारक भी होते हैं जो संघ के सिद्धातों पर काम करते हैं। हर कार्यकर्ता को संघ शिक्षा शिविरों में चार स्तर के वैचारिक और शारीरिक अभ्यास से गुजरना होता है। आरएसएस में 95 प्रतिशत प्रचारक को गृहस्थ कार्यकर्ता कहा जाता है, जो पारिवारिक जीवन बिताते हैं और वक्त-वक्त पर संघ के दायित्व निभाते हैं। पांच प्रतिशत कार्यकर्ता ऐसे हैं, जो अपना पूरा जीवन आरएसएस को ही समर्पित कर देते हैं। ये पूर्ण प्रचारक कहे जाते हैं।

अब समझते हैं शाखा की संरचना
स्वयं सेवकों की संख्या एक करोड़ से ज्यादा बतायी जा रही है। इससे ऊपर बढ़ते क्रम में शाखा के बाद ग्राम, मंडल, खंड, नगर, तहसील, जिला विभाग, प्रांत, क्षेत्र, के बाद केन्द्र होता। महानगरों में उपबस्ती, उससे ऊपर बस्ती, बस्ती के ऊपर नगर और नगर के ऊपर भाग, भाग के ऊपर महानगर है। लखनऊ महानगर में चार भाग हैं। महानगर में 50 से ऊपर शाखा होनी चाहिए। इससे नीचे महानगर का गठन नहीं हो सकता। विभिन्न स्तरों पर प्रचारक की निगरानी हमेशा बनी रहती है।
कितने तरह की होती हैं शाखाएं, शाखा में होता क्या है?
शाखा वह जगह है, जहां स्वयं सेवक बौद्धिक के माध्यम से तैयार होते हैं। यह खुली जगह पर एक घंटे तक लगती है। इसी में ध्वज प्रणाम, सूर्य नमस्कार, व्यायाम, गीत, प्रार्थना और बौद्धिक सब हो जाता है। शाखा में प्रार्थना अवश्य होनी चाहिए। संघ की प्रार्थना है- “नमस्ते सदा वत्सले मातृ भूमि, त्वया हिंद भूमि सुखम वर्धितोहम।………” । शाखाओं के भी विभिन्न प्रकार हैं। प्रभात शाखा सुबह लगती है। सबसे ज्यादा संख्या इसी की है। शाम को लगने वाली शाखा को सांध्य कालीन शाखा कहते हैं। इसके अतिरिक्त रात्रि शाखा भी लगती है। सप्ताह में एक या दो बार मिलने का भी एक विधान है, जहां पर बैठक राष्ट्रवादी विचारों का आदान-प्रदान होता है। इसे “मिलन” कहा जाता है। महिने में एक या दो बार लगने वाली शाखा को “संघ मंडली” कहते हैं।
विश्व के दूसरे देशों में भी लगती शाखाएं, लेकिन दूसरे नाम से
विश्व के अन्य देशों में शाखाओं का कार्य चलता है, लेकिन यह राष्ट्रीय स्वयं सेवक के नाम से नहीं चलता। कहीं पर भारतीय स्वयं सेवक संघ तो कहीं पर हिंदू स्वयं सेवक संघ के नाम से चलता है। वर्तमान में संघ की शाखाएं दूसरे 65 देशों में लग रही हैं।
संघ शिक्षण वर्ग
समाज, राष्ट्र और धर्म की शिक्षा के समय-समय पर विभिन्न संघ शिक्षण वर्ग भी लगता है, जहां पर विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है। इसमें दीपावली वर्ग तीन दिनों का होता है। यह तालुका या नगर स्तर पर आयोजित होता है। शीत शिविर या हेमंत शिविर भी तीन दिन तक जिला या विभाग स्तर पर आयोजित किया जाता है। यह हर वर्ष दिसंबर माह में आयोजित होता है। निवासी वर्ग शाम से सुबह तक होता है। यह हर महीने शाखा, नगर या तालुका द्वारा आयोजित होता है।
संघ शिक्षा वर्ग
इसमें कुल चार प्रकार के वर्ग होते हैं, यह सभी उच्च स्तरीय प्रशिक्षण हैं। इसमें प्राथमिक वर्ग, प्रथम वर्ष, द्वितीय वर्ष और तृतीय वर्ष हैं। प्राथमिक वर्ग एक सप्ताह का होता है। प्रथम वर्ग और द्वितीय वर्ग 20-20 दिन के होते हैं, जबकि तृतीय वर्ग 25 दिनों का होता है। प्राथमिक वर्ग का आयोजन सामान्यतया जिला करता है। वहीं प्रथम संघ शिक्षा वर्ग या प्रथम वर्ष का आयोजन सामान्यत: प्रांत करता है। द्वितीय संघ शिक्षा वर्ग अथवा द्वितीय वर्ष का आयोजन क्षेत्र करता है, तृतीय वर्ष या तृतीय संघ शिक्षा वर्ग का आयोजन हर साल नागपुर में ही होता है।
संघ के बदलाव के बारे में तीसरे सरसंघचालक ने कहा था, जीवित प्राणी में जरूर होता है बदलाव
अन्य संस्थाओं की तरह संघ में भी बहुत बदलाव आया है। इससे संघ कभी परहेज भी नहीं करता। पहले खाकी हाफ पैंट होता था, अब व फुलपैंट हो गया है। इस तरह कई कार्य पद्धति में बदलाव आए हैं। अब एक मुस्लिम राष्ट्रीय मंच भी संघ का आनुषांगिक संगठन है, जिसमें राष्ट्रवादी मुस्लिम स्वयं सेवक हैं और दूसरों को राष्ट्र के प्रति प्रेम की शिक्षा देते हैं। संघ के तीसरे सरसंघचालक बाला साहेब देवरस ने अक्टूबर 1976 में विजयादशमी उत्सव पर नागपुर में कहा था, “कुछ लोगों द्वारा कहा जा रहा है कि संघ बदल रहा है और इसे आगे भी बदलना है। सभी जीवित प्राणी अपने स्वाभाविक रूप में बदलते हैं। यह उनके विकास का संकेत है। जो बदल नहीं रहा है, वह जीवित नहीं है, मृत है। पर इस बदलाव को अपनी जीवनधारा की शिराओं को काटकर नहीं अपनाया जा सकता है।
संस्कृत भारती के महानगर अध्यक्ष का है कहना;
संस्कृत भारती के लखनऊ महानगर अध्यक्ष विनय जी का कहना है कि शाखा और उससे ऊपर मंडल की व्यवस्था पहले महानगरों में भी चलती थी, लेकिन लगभग दस साल पूर्व यह व्यवस्था बदल गयी। उन्होंने कहा कि स्वयं सेवक शब्द से ही स्वयं सेवक की निष्ठा का अंदाजा लगाया जा सकता है। स्वयं सेवक शब्द हमारे लिए दृढ वाक्य हैं। इस पर अमल कर हम हमेशा राष्ट्र निर्माण के लिए संकल्पित और दूसरों को प्रेरित करने का काम करते हैं।
प्रचार प्रमुख ने लिखा है, संघ का उद्देश्य है समाज को मजबूत करना
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर अपनी किताब ‘आरएसएस: 21वीं सदी के लिए रोडमैप’ में लिखते हैं कि संघ समाज पर शासन करने वाली एक अलग शक्ति नहीं बनना चाहता और उसका मुख्य उद्देश्य समाज को मज़बूत करना है। ‘संघ समाज बनेगा’ एक नारा है, जो आरएसएस में बार-बार लगाया जाता है।

सरसंघचालक ने कहा था, कार्य प्रणाली है संघ और कुछ नहीं
मौजूदा सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा है कि संघ एक “कार्य प्रणाली है और कुछ नहीं”. उनके मुताबिक़, आरएसएस “व्यक्ति निर्माण का काम करता है।”.शाखा संघ की आधारभूत संगठनात्मक इकाई है, जो उसे ज़मीनी स्तर पर एक बड़ी मौजूदगी देती है। शाखा वह जगह है, जहाँ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्यों को वैचारिक और शारीरिक रूप से प्रशिक्षित किया जाता है।
गैर-राजनीतिक संगठन, लेकिन भाजपा में अभिभावक की भूमिका
वैसे तो संघ एक गैर-राजनीतिक सांस्कृतिक संगठन है, लेकिन उसके विचारों से भाजपा मतैक्य है। इस कारण संघ भाजपा की सहायता करता है और भाजपा के अभिभाववक की भूमिका भी निभाता रहा है। भाजपा के संगठनमंत्री संघ से जुड़े लोग ही होते हैं। ग़ैर-राजनीतिक होने के दावों के बावजूद संघ के अनेक लोग चुनावी राजनीति में सक्रिय रहे हैं। इनमें पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक बहुत सारे नाम गिनाए जा सकते हैं।
भाजपा का संगठन मंत्री देता है संघ
एक बार आरएसएस सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा था कि जो भी राजनीतिक दल उनसे संगठन मंत्री मांगता है, संघ उसे देता है। भागवत ने कहा, “अभी तक और किसी ने माँगा नहीं है (बीजेपी के अलावा), मांगेंगे तो हम विचार करेंगे। काम अच्छा है तो ज़रूर देंगे।” इसके साथ ही उन्होंने कहा कि संघ की एक नीति है और संघ की बढ़ती ताक़त का फ़ायदा उन राजनीतिक दलों को मिलता है, जो उस नीति का समर्थन करते हैं। जो इसका लाभ ले जा सकते हैं, ले जाते हैं। जो नहीं ले सकते, वो रह जाते हैं।”
स्वयं सेवक एक करोड़, मगर रजिस्ट्रेशन नहीं
.संघ के रजिस्टर्ड न होने पर भी कई लोग इसकी आलोचना करते हैं और उसमें पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी बताते हैं। विरोधी कई बार यह आरोप भी लगाते हैं कि संघ की फंडिंग को लेकर कोई पारदर्शिता नहीं है, क्योंकि संघ इनकम टैक्स या आयकर रिटर्न फाइल नहीं करता। इस पर संघ का जवाब आता है कि वह एक आत्मनिर्भर संगठन है और संघ के काम के लिए संगठन के बाहर से कोई पैसा नहीं लिया जाता, भले ही वो स्वेच्छा से दिया गया हो।
गुरुदक्षिणा से चलता संघ का खर्च
अपने खर्च को पूरा करने के लिए संघ गुरुदक्षिणा का कार्यक्रम हर वर्ष सावन माह में कराता है। हर स्वयं सेवक भगवा ध्वज को गुरु मानकर अपनी स्व की इच्छा अनुसार बंद लिफाफे में धन देता है। यह धन गुप्त होता है। इसके बाद ध्वज प्रणाम किया जाता है और इस अवसर पर बौद्धिक का कार्यक्रम भी होता है, जिसमें कोई न कोई संघ का पदाधिकारी संघ के बारे में और वर्तमान में क्या चल रहा है, विस्तार से चर्चा करता है। भागवत के मुताबिक़, संघ एक ‘बॉडी ऑफ़ इंडिविजुअल्स’ यानी व्यक्तियों का एक समूह है और इस वजह से उस पर टैक्स नहीं लगाया जा सकता।
भागवत ने कहा है- संघ रखता एक-एक पाई का हिसाब
भविष्य का भारत- संघ का दृष्टिकोण नामक किताब में सरसंघचालक भागवत ने कहा है कि भले ही सरकार संघ से हिसाब-किताब नहीं मांगती, लेकिन अपनी विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए संघ एक-एक पाई का हिसाब रखता है। हर साल ऑडिट करता है और अगर सरकार कभी मांगे तो संघ का हिसाब तैयार है।
80 संगठन हैं आरएसएस के समूह में, करते राष्ट्रहित का काम
यह भी कहा जा सकता है कि आरएसएस कई संगठनों का समूह है। इसके तहत वर्तमान में 80 से अधिक आनुषांगिक या समविचारी संगठन हैं। यहां भी संघ की भांति ही विभिन्न स्तरों पर पूर्णकालिक स्वयं सेवक होते हैं और उनकी नियुक्ति प्रचारक के तौर पर होती है। इनमें विद्या भारती शिक्षा के क्षेत्र में काम काम करता है, जिसके तहत पूरे भारत में 21,000 से अधिक स्कूलों का संचालन हो रहा है। वहीं सेवा भारती वंचितों और गरीबों के लिए काम करने वाला संगठन है। भारतीय मजदूर संघ श्रमिकों के अधिकारों के लिए काम करता है। वहीं संस्कार भारती कलाकारों के लिए काम करने वाला संगठन है। अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम: वनवासियों के कल्याण के लिए काम करने वाला संगठन है, जो उनके लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य सेवाएं प्रदान करता है।
ये भी प्रमुख संगठनों में शामिल
इसके अलावा विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल, स्वदेशी जागरण मंच, राष्ट्रीय सिख संगत, हिन्दु युवा वाहिनी, भारतीय किसान संघ आदि भी इनके प्रमुख संगठन है। बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद ने अयोध्या आंदोलन के समय प्रमुख भूमिका निभायी थी।
कई बार लगे प्रतिबंध, लेकिन निखरता रहा संघ
संघ की स्थापना के बाद कई बार उसे अग्नि परीक्षा से भी गुजरना पड़ा। संघ के पदाधिकारी और स्वयं सेवकों को प्रताड़नाएं भी दी गयीं, लेकिन संघ कभी अपने विचारों से डिगा नहीं, टूटा नहीं, हमेशा अडिग रहा और प्रतिबंध रूपी आग में तपने के बाद और उसमें निखार ही आता चला गया। पहली बार संघ पर प्रतिबंध महात्मा गांधी की हत्या के बाद 1948 में लगा था। उस समय सरकार को आशंका थी कि गांधी जी का हत्यारा नाथू राम गोड्से स्वयं सेवक था। संघ के तत्कालीन सरसंघचालक गोलवलकर को गिरफ़्तार कर लिया गया। यह प्रतिबंध एक साल तक लगा रहा। दूसरी बार आपात काल के समय इंदिरा गांधी ने 1975 में प्रतिबंध लगाया था, उस समय भी आरएसएस के प्रमुख लोगों को प्रताड़ना झेलनी पड़ी। स्वयं सेवक जेलों में ठूस दिये गये। यह प्रतिबंध साल 1977 में आपातकाल के ख़त्म होने के साथ ही हट गया। साल 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद आरएसएस पर तीसरी बार प्रतिबंध लगाया गया, लेकिन जून 1993 में बाहरी आयोग ने इस प्रतिबंध को अनुचित माना और सरकार को उसे हटाना पड़ा।



