नई दिल्ली: आज की तेज रफ्तार जिंदगी में प्लास्टिक हर चीज का हिस्सा बन चुका है, चाहे वो पैकेजिंग हो, कपड़े हों या घरेलू सामान। लेकिन इस सुविधा की कीमत हमारी सेहत पर चुकानी पड़ रही है। छोटे-छोटे प्लास्टिक कण, जिन्हें माइक्रोप्लास्टिक (Microplastics) कहा जाता है, अब हवा, पानी और भोजन में घुलमिल चुके हैं। हाल की एक महत्वपूर्ण स्टडी ने चेतावनी दी है कि ये कण न सिर्फ पर्यावरण को बर्बाद कर रहे हैं, बल्कि हमारी हड्डियों को भी कमजोर बना रहे हैं, जिससे विकास रुक सकता है और बीमारियां बढ़ सकती हैं।
प्लास्टिक का वैश्विक संकट
दुनिया में सालाना 40 करोड़ टन से ज्यादा प्लास्टिक बनता और इस्तेमाल होता है। इसका ज्यादातर कचरा नदियों, महासागरों और यहां तक कि समुद्र की 11,000 मीटर गहराई तक पहुंच जाता है। प्लास्टिक उत्पादन से हर साल 1.8 अरब टन ग्रीनहाउस गैसें निकलती हैं, जो जलवायु संकट को और गहरा कर रही हैं। ये कण टूटकर माइक्रोप्लास्टिक बनते हैं, जो दिखने में छोटे लेकिन असर में घातक साबित हो रहे हैं।
शरीर के हर कोने में घुसपैठ
शोध बताते हैं कि माइक्रोप्लास्टिक अब इंसानी शरीर के अंदरूनी हिस्सों में भी पाए जा रहे हैं। वैज्ञानिकों ने इन्हें खून, दिमाग, गर्भाशय की परत, स्तन दूध और हड्डियों तक में खोज लिया है। रोजाना इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक उत्पादों से ये कण हवा में उड़ते हैं, पानी में घुलते हैं और भोजन के जरिए अंदर पहुंचते हैं। सांस लेने, खाने या त्वचा के संपर्क से ये शरीर में घुस जाते हैं, और अब इनका असर हड्डियों पर भी साफ दिख रहा है।
ब्राजील स्टडी का चौंकाने वाला नतीजा
ब्राजील की स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ कैंपिनास के लैबोरेटरी फॉर मिनरल एंड बोन स्टडीज इन नेफ्रोलॉजी के शोधकर्ताओं ने 62 वैज्ञानिक पेपर्स की गहन समीक्षा की। यह रिपोर्ट ‘ऑस्टियोपोरोसिस इंटरनेशनल’ जर्नल में छपी है। स्टडी से पता चला कि माइक्रोप्लास्टिक हड्डियों की कोशिकाओं को कई तरह से नुकसान पहुंचाते हैं। लैब टेस्ट में देखा गया कि ये बोन मैरो के स्टेम सेल्स को कमजोर करते हैं, ऑस्टियोक्लास्ट्स (हड्डी तोड़ने वाली कोशिकाएं) की संख्या बढ़ाते हैं, जिससे हड्डी का घनत्व घटता है। ये कोशिकाओं की उम्र तेजी से बढ़ाते हैं, उनकी कार्यक्षमता घटाते हैं, संरचना बिगाड़ते हैं और सूजन पैदा करते हैं। पशुओं पर हुए एक्सपेरिमेंट्स ने और गंभीर तस्वीर पेश की। माइक्रोप्लास्टिक एक्सपोजर से हड्डियों का ग्रोथ रुक गया, हड्डियां कमजोर और टेढ़ी-मेढ़ी हो गईं, असामान्य विकास हुआ और फ्रैक्चर का खतरा बढ़ गया। शोधकर्ता रोड्रिगो बुएनो डे ओलिवेरा ने कहा, “ये कण हड्डियों के मेटाबॉलिज्म को जड़ से प्रभावित करते हैं, जो ऑस्टियोपोरोसिस जैसी बीमारियों को ट्रिगर कर सकते हैं।”
सिर्फ सतह पर नहीं, जड़ तक असर
माइक्रोप्लास्टिक का नुकसान सतही नहीं है। ये हड्डियों की आंतरिक प्रक्रियाओं को बिगाड़ते हैं, जैसे कोशिकाओं का डिफरेंशिएशन और ऑटोफैगी। एक अन्य स्टडी में पाया गया कि पॉलीस्टाइरीन माइक्रोप्लास्टिक बोन होमियोस्टेसिस को डिस्टर्ब करते हैं, जिससे ऑस्टियोब्लास्ट और ऑस्टियोक्लास्ट का बैलेंस बिगड़ जाता है। ब्राजील टीम अब चूहों के फीमर बोन पर इनके बायोमैकेनिकल इफेक्ट्स टेस्ट कर रही है, ताकि ह्यूमन हेल्थ पर सटीक असर समझा जा सके।
ऑस्टियोपोरोसिस: बढ़ता वैश्विक बोझ
इंटरनेशनल ऑस्टियोपोरोसिस फाउंडेशन के मुताबिक, 2050 तक हड्डी फ्रैक्चर के केसेज में 32% की बढ़ोतरी हो सकती है। पहले इसे उम्र, डाइट और लाइफस्टाइल से जोड़ा जाता था, लेकिन अब माइक्रोप्लास्टिक को एक बड़ा पर्यावरणीय फैक्टर माना जा रहा है। बढ़ती उम्र की आबादी में ये जोखिम और ज्यादा हो जाता है।
बचाव के रास्ते: क्या करें हम?
विशेषज्ञों का कहना है कि हड्डियों को स्वस्थ रखने के लिए एक्सरसाइज, कैल्शियम-विटामिन डी रिच डाइट और दवाएं तो जरूरी हैं, लेकिन माइक्रोप्लास्टिक कंट्रोल पर फोकस भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
प्लास्टिक यूज घटाएं: सिंगल-यूज प्लास्टिक से बचें, रीयूजेबल बैग और बोतल अपनाएं।
जागरूकता फैलाएं: स्कूलों और कम्युनिटी में प्रदूषण के असर पर बात करें।
नीतिगत बदलाव: सरकारों से सख्त रेगुलेशंस की मांग करें, जैसे प्लास्टिक प्रोडक्शन पर टैक्स।
रिसर्च सपोर्ट: ऐसे स्टडीज को फंडिंग दें जो माइक्रोप्लास्टिक के हेल्थ इंपैक्ट्स पर काम करें।



