पटना: बिहार की जनता के बारे में एक जुमला काफी लोकप्रिय है कि बिहारी जनता चुनाव के लिए मतदान नहीं करती, बल्कि अपनी जाति के लिए मतदान करती है। संघर्ष के इतिहास में महानायकों की धरती पर आधुनिक भारत में इस जातिगत राजनीति का इतिहास 1936 से शुरु होता है। उस समय बिहार में प्रांतीय चुनाव होने वाले थे और स्वतंत्रता आंदोलन में कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाले अनुग्रह नारायण सिंह और श्रीकृष्ण सिंह में प्रदेश की अगुवाई के लिए खींचतान शुरु हो गयी। श्रीकृष्ण सिंह भूमिहार थे, जबकि अनुग्रह नारायण सिंह क्षत्रिय।
केंद्रीय नेतृत्व की भी इन नेताओं की गतिविधियों पर नज़र थी। उधर दोनों नेताओं के समर्थकों में अपने-अपने नेता को मुख्यमंत्री पद पर बैठाने के लिए मनमुटाव बढ़़ता चला जा रहा था। इसको सुलझाने के लिए केन्द्रीय नेतृत्व ने आखिरकार राजेन्द्र प्रसाद को अधिकृत किया। राजेन्द्र प्रसाद ने काफी मशक्कत के बाद दोनों के बीच मध्यस्थता की और श्रीकृष्ण सिंह बिहार के मुख्यमंत्री (उस समय मुख्यमंत्री नहीं, प्रीमियर अर्थात प्रधानमंत्री कहा जाता था।) बने और अनुग्रह नारायण सिंह उप मुख्यमंत्री बने। दोनों ने मिलकर बिहार का बहुत विकास किया।

बिहार की राजनीति में जाति हावी
बिहार के गोपालगंज निवासी और नई दुनिया के संपादक सतीश श्रीवास्तव का कहना है कि बिहार में अब भी जातिगत आधार राजनीति में हावी है। उसको दूर करना बहुत ही मुश्किल काम है। नीतीश कुमार की मतदाताओं में पकड़ इसी कारण से बनी हुई है कि वे कुर्मी जाति से आते हैं और वे अपनी बिरादरी में मजबूत पकड़ रखते हैं। तमाम आरोपों के बावजूद कभी भी यादव बिरादरी ने लालू प्रसाद यादव का साथ नहीं छोड़ा, मुस्लिम बिरादरी भी सदा उनके साथ बनी रही, जिससे दोनों पार्टियां आज तक बिहार में प्रमुख बनी हुई हैं।
जनता है जागरूक
बिहार में भाजपा संगठन में प्रदेश सचिव संतोष रंजन राय का कहना है कि अब जनता जागरूक हो गयी है। विकास के नाम पर सभी लोग एनडीए के साथ हैं। जातियां कुछ हद तक हावी रहती हैं, लेकिन वह ज्यादा मायने नहीं रखती। अभी वर्तमान में सिर्फ एमवाई (मुस्लिम और यादव) को छोड़ दिया जाये तो सभी लोग एनडीए के साथ हैं। उ.प्र प्रदेश बार्डर पर अल्प संख्या में दलित वर्ग बसपा के साथ चला जाता है। उन्होंने कहा कि पहले जाति हावी जरूर थी, लेकिन जब से केन्द्र की राजनीति में नरेन्द्र मोदी आये, तब से जाति पर राष्ट्रवाद हावी हो गया और इसका दायरा लगातार बढ़़ता जा रहा है। जातीय पहचान गौड़़ होती जा रही हैं।
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जातीय समीकरण अलग करना मुश्किल
राजनीतिक समीक्षक हर्ष वर्धन त्रिपाठी का कहना है कि बिहार की राजनीति में कभी भी जातीय समीकरण को अलग नहीं किया जा सकता है। हर राजनीतिक दल जातीय समीकरण जरूर बैठाता है। हालांकि यह समीकरण पूरा काम नहीं करता। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समय में यह कुछ हद तक गौड़़ जरूर हुआ है। राष्ट्रवादी सोच बढ़ी है, फिर भी राजनीति में जातीय वर्चस्व अब भी कायम है।
शुरु के वर्षों में सवर्णों ने किया राज
आजादी के बाद बीस वर्षों तक सर्वणों ने राज किया और पहले सीएम के रुप में श्रीकृष्ण सिंह काबिज हुए, जो कि भूमिहार थे। यह कहा जा सकता है कि 31 जनवरी 1961 तक भूमिहार युग रहा, जिसका नेतृत्व श्रीकृष्ण सिंह करते रहे। भूमिहार और राजपूत स्वाभाविक रूप से एक-दूसरे के विरोधी थे किन्तु दोनों जातियों को साधने के लिए ही श्रीकृष्ण सिंह को मुख्यमंत्री तो अनुग्रह नारायण सिंह को उपमुख्यमंत्री बनाया गया था। इन दोनों ने मिलकर बिहार का काफी विकास भी किया। शासनकाल के दौरान कभी इन दोनों के बीच का अंदरूनी संघर्ष सतह पर नहीं आया और आमजन भी संतुष्ट रहे। फिर दीप नारायण सिंह 1 फरवरी 1961 को मुख्यमंत्री बने, लेकिन वे 17 दिन तक ही कुर्सी पर बने रह सके।
सबसे पहले विनोदानंद बने ब्राह्मण सीएम
इसके बाद बिहार का प्रतिनिधित्व विनोदानंद झा ने किया। वे करीब ढाई वर्षों तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे। विनोदानंद झा देवघर के रहने वाले थे, जो अब झारखंड में है। केंद्रीय कलकत्ता कालेज से शिक्षा प्राप्त करने वाले विनोदानंद झा फरवरी 1961 से अक्टूबर1963 तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे। इनका कुल कार्यकाल 226 दिन का रहा।
कायस्थ बिरादरी के मुख्यमंत्री के रूप बल्लभ सहाय को पिछड़ों ने दिया था सपोर्ट
इसके बाद कायस्थ बिरादरी का वर्चस्व बढ़ता गया और बिहार के चौथे मुख्यमंत्री के रूप में कृष्ण बल्लभ सहाय मुख्यमंत्री बने। यह कहा जा सकता है कि कृष्ण बल्लभ पहले मुख्यमंत्री थे, जो अपनी जाति की संख्या के बल पर नहीं, लोगों में स्वीकार्यता के दम पर मुख्यमंत्री बने थे। वे 1963 से 1967 तक मुख्यमंत्री बने रहे। भूमिहार और राजपूतों को सत्ता से दूर करने में दलित और पिछड़े वर्ग की बड़ी भूमिका थी, जो सहाय को कुर्सी तक ले गयी।
तीन पिछड़ी जातियों ने मिलकर बनाया था त्रिवेणी संघ
इस बीच दलित और पिछड़ा वर्ग भी राजनीति की धुरी बनने के लिए तड़़फड़ा रहा था। आजादी से पूर्व ही 1930 के दशक में ही यादव, कोईरी और कुर्मी बिरादरी ने मिलकर एक त्रिवेणी संघ की स्थापना की थी। इस मोर्चे के गठन से जुड़े नेता यदुनंदन प्रसाद मेहता (कुशवाहा नेता),शिवपूजन सिंह(कुर्मी नेता) और जगदेव सिंह यादव(यादव नेता) थे। यह जातीय गठबंधन एक राजनीतिक दल था, लेकिन पिछड़ी या दलित जातियां साठ के दशक तक राजनीति में आगे नहीं बढ़ पायीं।
पिछड़े व दलित वर्ग को एकजुट करने का श्रेय कर्पूरी ठाकुर को

बिहार में पिछड़ी जाति को एकजुट करने का श्रेय कर्पूरी ठाकुर को जाता है, जो नाई समुदाय से थे। 1970 के दशक में कर्पूरी ठाकुर दलित और पिछड़े समाज की आवाज़ बन चुके थे और धीरे-धीरे बिहार में सत्ता की कहानी, जो भूमिहारों से शुरू हुई थी, वह राजपूत, ब्राम्हण, कायस्थ और पिछड़ों के बाद दलितों के हाथ में जा चुकी थी। बिहार में जातिगत सत्ता-स्थानांतरण की मुख्य वजह थी दलितों और पिछड़ों में राजनीतिक जागरूकता। यहीं से बिहार में राजनीतिक अस्थिरता का दौर भी शुरू हो गया था।
37 वर्षों तक बिहार की कुर्सी पर रहे सवर्ण
यदि सवर्ण, ओबीसी और एससी समुदाय के सीएम पर बात करें तो बिहार में 37 तक सवर्णों ने कुर्सी संभाली। ओबीसी समुदाय का भी इतने दिन ही सीएम की कुर्सी पर बने रहने का रिकार्ड है। वहीं दलित वर्ग के तीन सीएम बने, लेकिन ज्यादा दिन तक टिक नहीं सके। जब से लालू और नीतीश का राज आया तब से इन्हीं दोनों के बीच सीएम की कुर्सी चिपक सी गयी है। यही कारण है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ही पार्टियां इन दोनों की अगुवाई में ही बिहार की राजनीति करने को विवश हैं।



