लखनऊ: राम मंदिर आंदोलन का जब भी नाम लिया जाएगा, कल्याण सिंह उसमें सबसे ऊपर होंगे। 21 अगस्त को उनकी पुण्यतिथि हिंदू गौरव दिवस के रूप में मनाई जाएगी, लेकिन मंदिर आंदोलन से जुड़े लोगों की स्मृति में हमेशा बने रहेंगे। कल्याण सिंह एक लंबी राजनीतिक यात्रा के साक्षी रहे। उनके जीवन की सबसे बड़ी घटना वर्ष 1992 में उस दिन हुई, जब अयोध्या में विवादित ढांचे को ढहा दिया गया था। 6 दिसंबर को कल्याण सिंह लखनऊ के कालिदास मार्ग स्थित अपने घर पर थे, जिस वक्त अयोध्या में कारसेवकों की भीड़ ने विवादित ढांचे को ध्वस्त कर दिया था। उन्होंने ने तबके मुख्य सचिव और डीजीपी को इस संबंध में लिखित आदेश दे दिए कि अयोध्या में कारसेवकों पर गोली ना चलाई जाए।
इससे पहले मुलायम सिंह यादव के यूपी के मुख्यमंत्री रहते जो कार सेवा अयोध्या में हुई थी, उसमें पुलिस ने लोगों को विवादित ढांचे तक पहुंचने से रोकने के लिए फायरिंग कर दी थी। इसमें कई कार सेवकों की जान चली गई थी। लेकिन जब 6 दिसंबर 1992 को कल्याण सिंह के मुख्यमंत्री रहते, कार सेवा हुई तो कार सेवकों ने पूरे विवादित ढांचे को गिराकर मंदिर निर्माण का रास्ता साफ कर दिया था। इतना ही नहीं उस विवादित ढ़ांचे की एक-एक ईंट को लोग अपने साथ घर ले गए थे।
कार सेवा जैसे ही संपन्न हुई, बिना देर किये कल्याण सिंह ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। केंद्र में उस समय पी.वी नरसिंहा राव प्रधानमंत्री थे। कहा जाता है कि इसमें नरसिंहा राव की भी मौन स्वीकृति थी, लेकिन खुलकर कल्याण सिंह खेल रहे थे। यदि अयोध्या में भव्य मंदिर बनने का श्रेय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को दिया जाएगा, तो उसकी नींव रखने का श्रेय हमेशा ही अशोक सिंघल और कल्याण सिंह को दिया जाता रहेगा।
शिलान्यास के समय नहीं बुलाया गया कल्याण को
कार सेवक आज यह भी नहीं भूल पाते हैं कि मंदिर शिलान्यास के अवसर पर कल्याण सिंह को नहीं बुलाया गया। शायद यह उनके द्वारा बाद में की गयी गलती का परिणाम के तौर पर था, जिसमें वे कुछ समय के लिये कार सेवकों पर गोलियां चलाने वाले मुलायम सिंह से भी हाथ मिला लिया था। उस समय कार सेवा में भाग लेने वाले अमर राय ने बताया कि शिलान्यास के समय यदि कल्याण सिंह मौजूद होते तो पूरी मीडिया का ध्यान उनकी तरफ चला जाता। राजनीति में हर व्यक्ति खुद को ही आगे रखना चाहता है। शायद यही कारण रहा कि कल्याण सिंह को शिलान्यास के समय नहीं बुलाया गया था।
विचार और संकल्प को कुर्सी से बड़ा माना
भारतीय राजनीति में सत्ता की कुर्सी से चिपके रहने वाले नेताओं की कमी नहीं, मगर कल्याण सिंह उन गिने-चुने नेताओं में रहे जिन्होंने विचार और संकल्प को कुर्सी से बड़ा माना। राम जन्मभूमि आंदोलन में निर्णायक भूमिका निभाने वाले कल्याण सिंह ने सत्ता, अदालत और जेल हर मोर्चे पर जिम्मेदारी उठाकर राजनीति की नई परिभाषा गढ़ी। मुख्यमंत्री की कुर्सी गंवानी पड़ी तो बिना हिचक त्याग दिया, कारसेवकों पर गोली न चलाने का आदेश स्वीकार कर जेल गए और मंडल-मंदिर के बीच सामाजिक समीकरण गढ़कर भाजपा को नया जनाधार दिया।
अयोध्या जाने के लिए हेलीकाप्टर को ठुकरा दिया
राम जन्मभूमि आंदोलन में उनका योगदान ऐतिहासिक रहा। अयोध्या के संत आज भी यह याद करते हुए कहते हैं कि मुख्यमंत्री बनने के बाद जब वे अयोध्या आए तो हेलिकॉप्टर का प्रस्ताव ठुकरा दिया था। उन्होने साफ शब्दों में कहा था कि ‘अयोध्या की धरती पर सड़क मार्ग से आना ही मेरा सौभाग्य है।’ यह केवल यात्रा का अंदाज नहीं, बल्कि जनता से उनके गहरे जुड़ाव का प्रतीक था।
कल्याण ने ली जवाबदेही
दूसरी तरफ विवादित ढांचा गिरने के बाद लाल कृष्ण आडवाणी, डा. मुरली मनोहर जोशी, कल्याण सिंह सहित सैकड़ों भाजपा व विहिप के दिग्गजों पर मुकदमा दर्ज हुआ। उसमें सिर्फ कल्याण ने ही सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर यह भी माना कि गोली न चलाने का आदेश उन्होंने ही दिया था। उस दौर में जब नेता ठीकरा अधिकारियों पर फोड़ते थे, कल्याण सिंह ने जवाबदेही खुद उठाकर तिहाड़ जेल जाना स्वीकार किया।
सोशल इंजीनियरिंग का नया अध्याय लिखा
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक उनकी राजनीति का दूसरा चेहरा मंडल और मंदिर के बीच संतुलन साधने का था। मंडल फैसले से राजनीति कई धड़ों में बंटी, तब उन्होंने पिछड़ों-दलितों को भाजपा से जोड़कर ‘सोशल इंजीनियरिंग’ का नया अध्याय लिखा। इससे न भाजपा का जनाधार व्यापक हुआ बल्कि वह हिंदुत्व के साथ सामाजिक समीकरणों के शिल्पकार भी बने।
उप्र में पहली बार ओबीसी समुदाय जुड़ा भाजपा से
राजस्थान और हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल रह चुके कल्याण सिंह का जन्म लोधी परिवार में हुआ था। इस कारण भी जब वे राजनीति में आये तो पहली बार ओबीसी समुदाय को बड़ा हिस्सा भाजपा का समर्थक बना। इससे पहले भाजपा सिर्फ अगड़ों और बनिया की पार्टी के रूप में जानी जाती रही। वर्ष 2022 में भारत का दूसरा सर्वोच्च पुरस्कार पद्मविभूषण से सम्मानित कल्याण सिंह पहली बार 1991 में मुख्यमंत्री बने, जबकि दूसरी बार 1997 में।
शिक्षा में सुधार के लिए भी जाने जाएंगे कल्याण
कल्याण सिंह को उप्र में शिक्षा व्यवस्था के सुधार के लिए भी जाना जाएगा। इससे पूर्व एक ऐसा जमाना था, जब नकल माफियाओं का बोलबाला अपने चरम पर था। डिग्रियां खरीदी जाती थीं। स्कूलों में अराजकता चरम पर थी। शिक्षा माफिया खुलेआम पैसा लेकर नकल कराते थे, लेकिन कल्याण सिंह ने जब घोषणा की कि बोर्ड परीक्षा में परिंदा भी पर नहीं मार सकेगा तो लोगों को आश्चर्य हो रहा था और इसे सिर्फ राजनीतिक बयान से जोड़ा जा रहा था। इसका कारण था कि किसी को विश्वास नहीं था कि चरम पर पहुंच चुकी अराजकता पर कैसे अचानक रोक लग सकता है, लेकिन हकीकत में रोक लगी और वर्ष 1991 में यूपी बोर्ड की परीक्षा में परिंदा भी पर नहीं मार सका।
वकील संतोष पांडेय ने कहा
इलाहाबाद हाईकोर्ट के अधिवक्ता संतोष पांडेय कार सेवा को याद करते हुए बताया कि 30 अक्टूबर, 1990 को मुलायम सिंह यादव की सरकार ने आयोध्या में कारसेवकों पर गोलियां चलवाई थीं। अगले वर्ष 1991 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में मुलायम को मुख्यमंत्री को कुर्सी खोनी पड़ी और पहली बार बीजेपी को प्रदेश में अपना मुख्यमंत्री बनाने का मौका मिला। भाजपा ने इस पद के लिए कल्याण सिंह को चुना तो वो सीधे अयोध्या राम लला का दर्शन करने पहुंच गए। वहां उन्होंने अपना प्रण दुहराया, राम लला आपका मंदिर बनकर रहेगा, चाहे कुछ भी हो। कल्याण ने अपना संकल्प पूरा किया, भले ही उन्हें एक वर्ष में ही अपनी सरकार की आहुति देनी पड़ी।
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राम भक्तों के दिलों में सदा रहेंगे जिंदा
वहीं इलाहाबाद हाईकोर्ट के अधिवकता रजनीकांत राय कहते हैं कि कल्याण सिंह हमेशा रामभक्तों के दिलों में जिंदा रहेंगे। वही एक मात्र ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने कुर्सी जाने की परवाह नहीं की और सुप्रीम कोर्ट में दिए हलफनामे के मुताबिक बाबरी की सुरक्षा में असफल रहने की नैतिक जिम्मेदारी ली। उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें अदालत की अवमानना के लिए 2,000 रुपये का जुर्माना लगाकर उन्हें 24 घंटे के लिए तिहाड़ जेल भेज दिया। जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें उस समय पद खोने का कोई पछतावा है तो कल्याण सिंह ने जवाब दिया कि मुख्यमंत्री का पद भगवान राम के सामने कुछ भी नहीं है। वर्षों बाद जब सुप्रीम कोर्ट ने ही राम जन्मभूमि पर ही भव्य मंदिर बनाने का रास्ता साफ कर दिया तो कल्याण सिंह ने लखनऊ में अपने आवास पर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित किया।



