उत्तर प्रदेश में बसपा आइसोलेशन में, दलित वोटर पर सपा और भाजपा की निगाहें

चुनाव से करीब दो साल पहले ही उत्तर प्रदेश में सियासी हलचल शुरू हो गई है। सरकार और विपक्ष की रणनीति पर बात कर रहे हैं, वरिष्ठ पत्रकार उपेन्द्र नाथ राय...

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लखनऊ: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में होने हैं, लेकिन सरकार अभी से चुनावी मोड में आ गयी है। मुख्य विपक्षी दल सपा भी अपने चुनावी धार को देने में जुट गयी है। लोकसभा चुनाव में सपा ने 37 सीटें जीतकर पीडीए का सफल फार्मूला एक बार आजमा लिया है। सपा नेताओं में भी काफी उत्साह है और उन्हें विश्वास है कि आने वाले विधानसभा में इस बार उनकी सरकार बनेगी। उधर लोकसभा चुनाव के बाद विधानसभा की नौ सीटों पर हुए उप चुनाव में भाजपा ने छह सीटें कब्जा कर अपनी पीठ ठोक रही है और पीडीए का फार्मूला विफल बता रही है।

विधानसभा चुनाव में कौन बाजी मारेगा, यह पीडीए की सफलता और असफलता पर निर्भर करता है। लोकसभा चुनाव में दलित वर्ग का सपा की ओर झुकाव ने सपा को विजय दिला दी और कुछ दिन बाद ही हुए विधानसभा उपचुनाव में दलित वर्ग का सपा से हुए मोहभंग ने सपा को करारी मात दे दी। अभी विधानसभा सत्र के दौरान सपा की बागी विधायक पूजा पाल द्वारा विधानसभा में अतीक अहमद को मिट्‌टी में मिला देने पर योगी आदित्यनाथ की सराहना कर दी गयी। इस पर अखिलेश यादव ने उन्हें तुरंत पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। यह बताता है कि सपा की नजर में दलित से ज्यादा प्यार अल्पसंख्यक समुदाय पर है।

लोकसभा चुनाव के पूर्व अखिलेश यादव ने पीडीए का फार्मूला दिया था। इसको उन्होंने पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक से जोड़ा था। वे बार-बार कहते थे कि पीडीए की एकता भाजपा को हराएगी। उसका परिणाम रहा कि उप्र में अब तक की सबसे बड़ी जीत सपा ने हासिल की। अब इस पीडीए का फार्मूला को भाजपा परिवार डबलअप अथारिटी बता रही है और सपा के फार्मूले को परिवारवादी के रूप में परिभाषित कर रही है।

जीत-हार दलित वर्ग पर करेगा निर्भर

आगे आने वाले विधानसभा चुनाव में सपा का पीडीए (पिछ़डा, दलित और अल्पसंख्यक गठजोड़) और भाजपा द्वारा व्याख्यायित पीडीए (परिवार डवलपमेंट अथार्रिटी)  वाकयुद्ध का मुख्य मुद्दा बनेगा। जीत-हार भी दलित वर्ग के ऊपर ही निर्भर करता है। यह वर्ग जिस ओर झुकेगा, जीत उसी की होनी है। अब तक की सपा की राजनीति देखें तो अखिलेश यादव ने लोकसभा चुनाव में फार्मूला भले दिया लेकिन लोकसभा चुनाव के बाद कभी उन्होंने दलित वर्ग के लिए आवाज नहीं उठाई। यही कारण रहा कि विधानसभा के उपचुनाव में दलित वर्ग का सपा से मोहभंग हो गया।

अल्पसंख्यक के मोह में दलित से होती जा रही दूर

अब भी देखें तो संभल का मुद्दा हो या फतेहपुर में मकबरे में हिंदू धर्म के लोगों द्वारा मंदिर बताकर वहां पूजा के नाम पर उपद्रव करने का मुद्दा हो, सपा हमेशा बढ़-चढ़कर मुस्लिम समुदाय के पक्ष में बोलती है, लेकिन पूरे प्रदेश में आज तक किसी दलित वर्ग के मुद्दे को समाजवादी पार्टी ने कभी जोर-शोर से नहीं उठाया। इससे दलित समाज के लोग छला सा महसूस कर सकते हैं। अब निर्भर इस बात पर है कि आने वाले समय में समाजवादी पार्टी स्वयं को कितना दलित वर्ग का हितैशी दिखाकर उसको अपनी ओर आकर्षित कर सकती है।

बसपा का हासिए पर जाने से दलित तलाश रहा स्थायी ठौर

दलित वर्ग के वोट बैंक में सेंधमारी के पीछे बसपा का हासिए पर जाना है। बसपा धीरे-धीरे नीचे की ओर खिसकती जा रही है। एक तरफ लोकसभा चुनाव में जहां उसको एक भी सीट नहीं मिली। वहीं दूसरी तरफ विधानसभा चुनाव में कभी पूर्ण बहुमत की सरकार बना चुकी बसपा को पूरे प्रदेश में मात्र एक विधानसभा चुनाव जीतने में सफलता हासिल हुई थी। बसपा के हासिए पर जाने से दलित वर्ग अपना स्थायी ठौर तलाशने में जुट गया है। यदि देखा जाय तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों से वह बहुत हद तक उप्र में भाजपा की ओर आकर्षित तो हो रहा है, लेकिन अभी भी कभी अगड़ों और बनिया की पार्टी कहे जाने वाली भाजपा पर पूर्ण विश्वास नहीं हो रहा।

बसपा आइसोलेशन में जरूर, लेकिन कभी भी निकली सकती है बाहर

हालांकि, विधानसभा के नौ सीटों पर हुए उपचुनाव में सात विधानसभा क्षेत्रों में बसपा के उम्मीदवार तीसरे स्थान पर रहे थे। इससे बसपा की भी अहमियत समझ में आती है। आगे आने वाले चुनाव में बसपा भी स्वयं को जिंदा कर सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो बसपा आइसोलेशन में अवश्य है, लेकिन वह कभी भी इससे बाहर आ सकती है। राजनीत हमेशा अनिश्चितता से भरी होती है। इसमें कब किधर मतदाता झुक जाय, साफ-साफ नहीं कहा जा सकता।

राजनीतिक विश्लेषक ने कहा, अभी सक्रिय नहीं हो पा रही सपा

राजनीतिक विश्लेषक राजीव रंजन सिंह का कहना है कि इस बार सपा के लिए करो या मरो जैसी स्थिति है। फिर भी सपा अभी तक वह सक्रियता नहीं दिखा रही है, जो उसे दिखाना चाहिए। वह भी बसपा की तरह सिर्फ घर में बैठकर राजनीति करने की आदी होती जा रही है। वहीं भाजपा ने प्रोफेशनल के रूप में धरातल पर अपने बूथ स्तर तक के पदाधिकारियों को काफी सक्रिय कर चुकी है। किसी न किसी बहाने उन्हें हर वक्त सक्रिय रखती है। सक्रियता की निगरानी के लिए भाजपा ने ऐप भी बना रखें हैं, जिस पर फोटो, कार्यक्रम आदि अपलोड करना अनिवार्य कर दिया गया है।

वहीं, वरिष्ठ पत्रकार सुनील सिंह का कहना है कि सपा और भाजपा में जीत हार इस बात पर निर्भर करेगा कि हिंदूत्व हावी होगा या सपा का फुट डालो की नीति। यदि हिंदुत्ववादी छवि हावी रही तो भाजपा की जीत होगी। यदि इसमें भाजपा विफल रही तो सपा बाजी मार ले जाएगी।

चार बागी विधायकों पर कार्रवाई कर चुकी है सपा

समाजवादी पार्टी के विधायकों के अनुशासन की बात करें तो उप्र में फरवरी 2024 में हुए राज्यसभा चुनाव में सपा के सात विधायकों ने पार्टी लाइन से हटकर भाजपा उम्मीदवार को वोटिंग किया था। इन विधायकों में अभय सिंह, राकेश प्रताप सिंह, मनोज पांडेय, पूजा पाल, विनोद चतुर्वेदी, आशुतोष मौर्य और राकेश पांडेय थे। इसके बाद भी ये लोग लगातार पार्टी विरोधी गतिविधियों में संलिप्त रहे। पार्टी ने इसमें से तीन विधायकों गोसाईगंज सीट से अभय सिंह, अमेठी की गौरीगंज सीट से राकेश सिंह और रायबरेली की ऊंचाहार सीट से मनोज पांडेय को जून माह में ही बाहर का रास्ता दिखा दिया, लेकिन पूजा पाल सहित चार विधायकों के खिलाफ अभी कार्रवाई नहीं हुई थी। विधानसभा में अतीक के खिलाफ बोलने पर पूजा पाल को भी सपा ने निष्कासित कर दिया।

सपा विधायक ने योगी आदित्यनाथ को कहा धन्यवाद

पूजा पाल के पति राजू पाल की प्रयागराज में 25 जनवरी 2005 को दिन दहाड़े हत्या हुई थी। उनकी जब हत्या हुई थी, उससे नौ दिन पहले ही उनकी शादी पूजा पाल से हुई थी। पहली बार विधायक बने राजू पाल की हत्या में अतीक अहमद और उनके भाई अशरफ आरोपी बनाये गये थे। उनका मुकदमा पूजा पाल लड़ रही थीं। सपा से निकाले जाने के बाद पूजा पाल ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से भी भेंट की और उन्होंने एक्स पर लिखा, “मैं एक बार फिर मुख्यमंत्री का धन्यवाद करती हूं। उनके नेतृत्व में गुंडों और माफियाओं को उनकी सही जगह पहुंचाया जा रहा है, जो एक प्रगतिशील समाज के लिए बहुत जरूरी है।”

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