गंगा में African Catfish का कहर

बाढ़ के साथ बहकर आने वाली विदेशी नस्ल की African Catfish देसी मछलियें को खाने के साथ उनके पर्यावास को भी समाप्त कर रही हैं।

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भागलपुर: गंगा नदी अपनी जैव-विविधा और मछलियों की प्रजातियों के लिए जानी जाती है, अब एक विदेशी मेहमान के चलते खतरे का सामना कर रही है। हाल के वर्षों में African Catfish (क्लारियस गैरीपिनस) की मौजूदगी ने वैज्ञानिकों और मछुआरों की चिंता में डाल दिया है। यह मछली जो मूल रूप से अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका की नदियें में पाई जाती है। अपनी मांसाहारी प्रकृति और तेजी से प्रजनन की क्षमता के लिए कुख्यात है। गंगा में इसकी उपस्थित से रोहू, टेंगरा और देसी मछलियों को चट करने लगी है। जिससे देसी मछलियों की आबादी पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है।

जलीय पारिस्थितिकी और मछुआरों की आजीविका पर खतरा

गंगा नदी जो देश की जीवनरेखा मानी जाती है, अब African Catfish के कारण चर्चा में है। यह मछली न केवल स्थानीय जलीय पारिस्थित को खतरे में डाल रही है, बल्कि मछुआरों की आजीविका पर भी संकट खड़ा कर रही है।

कैट फिश कैसे पहुंची गंगा में

विशेषज्ञों का मानना है कि African Catfishसंभवत: एक्वेरियमें व्यापार या मछली पालन के दौरान गलती से गंगा में छोड़ी गई। कुछ जानकारों का कहना है कि बाढ़ के पानी के साथ यह मछली बिहार और उत्तर प्रदेश की नदियों मे बहकर आई। गाजीपुर के सैदपुर में मछुआरों ने हाल ही में एक ऐसी मछली पकड़ी थी, जिसके शरीर पर बिल्ली जैसे निशान और कांटेदार बनावट थी। इसे देखकर स्थानीय लोग हैरान रह गए। मछुआरे रविकांत निषाद ने बताया गूगल पर तस्वीर अपलोड की तब पता चला कि यह अफ्रीकी कैटफिश है। निषाद ने बताया कि ऐसी मछली पहले कभी नहीं देखा था।

देसी मछली के लिए खतरा

African Catfish की आक्रामक प्रकृत इसे देसी मछलियों के लिए घातक बनाती है।बनारस हिंदू विश्विवद्यालय के जंतु विज्ञान के प्रोफेसर बेचन लाल के अनुसार, यह मछली न केवल अन्य मछिलयों को खा जाती है बल्कि इनका तेजी से प्रचनन गंगा के जलीय  पारिस्थिति तंत्र को असंतुलित कर सकता है। खासतौर पर मार्च-अप्रैल में इनकी ब्रीडिंग के कारण इनकी संख्या तेजी से बढ़ सकती है जो स्थानीय प्रजातियों जैसे रोहू और टेंगरा के लिए विनाशकारी साबित हो सकती है।

मछुआरों की चिंता

गंगा किनारे बसे मछुआरे इस विदेशी मछली से परेशान हैं। मछुआरे अर्जुन निषाद बताते हैं। इस मछली के कांटेदार शरीर के कारण पकड़ना मुश्किल है। यह जाल में फंस कर उसे नुकसान पहुंचाती है। अगर इस मछली की आबादी बढ़ती गई तो मछुआरों की आजीविका पर भी असर पड़ेगा, क्योंकि देसी मछलियों की संख्या कम होने से बाजार में उनकी उपलब्धता घटेगी।

क्या है समाधान

विशेषज्ञों का सुझाव है कि इस मछली को नियंत्रत करने के लिए इसके प्रजनन स्थलों की पहचान और इसे नदी में प्रवेश करने से रोकने के उपाय किए जाएं। साथ ही मछुआरों को जागरूक करने और एक्वेरियम मछलियों को नदियों में छोड़ने से रोकने के लिए सख्त नियम लागू करने की जरूरत है।

मुंगेर भागलपुर जैसे क्षेत्र इनके लिए अनुकूल

जलवायु परिवर्तन से पानी का तापमान बढ़ता है, जो गैर देसी मछलियों के लिए फायदेमंछ होता  है लेकिन देसी के लिए हानिकारक। मुंगेर, भागलपुर, पीरपैंती में गाद के चलते विदेशी प्रजाति की मछलियों के पनाह लेने की संभावना बढ़ जाती है।

Sanjay Rai

sanjayrai.dj@gmail.com

संजय राय ने बीते 25 साल के प्रोफेशनल कैरियर में स्वास्थ्य, अपराध, शिक्षा, विकास समेत सभी बीट की कवरेज की है। दिल्ली सरकार, विधानसभा की कार्यवाही, भाजपा, कांग्रेस, आप सरीखे राजनीतिक दलों के साथ सामाजिक-सांस्कृतिक व आंदोलनात्मक गतिविधियों को भी कवर किया है। कई सत्रों में संसद की कार्यवाही पर भी कलम चलाई है। फिलवक्त NewG India में बतौर सीनियर स्पेशल काॅरेस्पोंडेंट अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं।

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