नई दिल्ली: बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव (bihar elections) से पहले चुनाव आयोग द्वारा शुरू की गई स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) प्रक्रिया ने राजनीतिक और कानूनी हलकों में बहस छेड़ दी है। विपक्ष का आरोप है कि यह प्रक्रिया नागरिकता की जांच का एक परोक्ष तरीका है, जबकि चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में स्पष्ट किया है कि मतदाता सूची से नाम हटने का अर्थ किसी व्यक्ति की नागरिकता समाप्त होना नहीं है। यह प्रक्रिया मतदाता सूची को अद्यतन और शुद्ध करने के लिए शुरू की गई है, लेकिन इसके आसपास कई सवाल उठ रहे हैं।
एसआईआर प्रक्रिया और सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई
चुनाव आयोग ने हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में दायर एक हलफनामे में कहा कि एसआईआर के तहत किसी व्यक्ति को मतदाता सूची से हटाए जाने का मतलब उसकी नागरिकता पर सवाल उठाना नहीं है। आयोग ने जोर देकर कहा कि यह प्रक्रिया संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप है और इसका उद्देश्य केवल मतदाता सूची की सटीकता सुनिश्चित करना है। सुप्रीम कोर्ट ने 10 जुलाई को इस प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई की थी और इसे रोकने से इनकार कर दिया था।
हालांकि, कोर्ट ने सुझाव दिया था कि आधार कार्ड, वोटर आईडी, और राशन कार्ड जैसे दस्तावेजों को मतदाता सूची अपडेट करने के लिए स्वीकार किया जाए। इसके जवाब में, आयोग ने स्पष्ट किया कि आधार कार्ड नागरिकता का प्रमाण नहीं है, और कई उच्च न्यायालयों ने भी इस तथ्य को स्वीकार किया है। अगली सुनवाई 28 जुलाई को निर्धारित है।
एसआईआर की प्रक्रिया और समय सीमा
चुनाव आयोग ने 24 जून को एक आदेश जारी किया था, जिसके तहत बिहार के लगभग 8 करोड़ मतदाताओं को 25 जुलाई तक ‘गणना फॉर्म’ भरकर जमा करना है। इस फॉर्म के आधार पर 1 अगस्त को एक ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी की जाएगी, जिसमें उन लोगों के नाम शामिल होंगे जिन्होंने फॉर्म जमा किया है, भले ही उन्होंने आवश्यक दस्तावेज जमा किए हों या नहीं। आयोग का कहना है कि यह प्रक्रिया मतदाता सूची को अद्यतन और साफ-सुथरा बनाने के लिए है। हालांकि, विपक्ष का दावा है कि यह प्रक्रिया नागरिकता की जांच का एक छिपा हुआ प्रयास है, जिसे गलत तरीके से लागू किया जा रहा है।
संवैधानिक और कानूनी ढांचा
भारत के संविधान में अनुच्छेद 324 से 329 तक चुनाव प्रक्रिया को निष्पक्ष और पारदर्शी बनाने का ढांचा दिया गया है। अनुच्छेद 324 एक स्वतंत्र चुनाव आयोग की स्थापना करता है, जबकि अनुच्छेद 325 यह सुनिश्चित करता है कि धर्म, जाति, नस्ल या लिंग के आधार पर किसी को मतदाता सूची से बाहर नहीं किया जा सकता। अनुच्छेद 326 प्रत्येक 18 वर्ष से अधिक उम्र के नागरिक को मतदान का अधिकार देता है, बशर्ते उसे किसी कानून के तहत अयोग्य न ठहराया गया हो।
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 16 के अनुसार, गैर-नागरिकों को मतदाता सूची में शामिल होने से रोका जाता है, और धारा 19 यह निर्धारित करती है कि मतदाता सूची में शामिल होने के लिए व्यक्ति को संबंधित निर्वाचन क्षेत्र का निवासी होना चाहिए।
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 यह सुनिश्चित करता है कि मतदाता सूची में शामिल प्रत्येक व्यक्ति को मतदान का अधिकार है, लेकिन जो लोग अयोग्य घोषित किए गए हैं या जेल में हैं, वे इस अधिकार का उपयोग नहीं कर सकते। अनुच्छेद 327 संसद और राज्य विधानसभाओं को चुनावी कानून बनाने का अधिकार देता है, जबकि अनुच्छेद 329 चुनावी मामलों में न्यायालयों के हस्तक्षेप को सीमित करता है।
मताधिकार: मौलिक अधिकार या संवैधानिक अधिकार?
सुप्रीम कोर्ट ने 2006 के कुलदीप नायर बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में स्पष्ट किया था कि मताधिकार एक संवैधानिक अधिकार है, न कि मौलिक अधिकार। इसका मतलब है कि यह अधिकार कुछ शर्तों के अधीन है और इसे कानून के तहत सीमित किया जा सकता है। चुनाव आयोग ने अपने हलफनामे में दोहराया कि एसआईआर प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची की शुद्धता बनाए रखना है, न कि नागरिकता को चुनौती देना।
आधार कार्ड और अन्य दस्तावेजों की भूमिका
चुनाव आयोग ने गणना फॉर्म के लिए 11 दस्तावेजों की सूची जारी की है, जिसमें आधार कार्ड, वोटर आईडी, और राशन कार्ड शामिल नहीं हैं। आयोग का कहना है कि आधार कार्ड नागरिकता का प्रमाण नहीं है, और फर्जी राशन कार्डों की समस्या के कारण इसे भी स्वीकार नहीं किया गया है। हालांकि, आधार को सहायक दस्तावेज के रूप में उपयोग करने की अनुमति है। यह प्रक्रिया उन लोगों के लिए चिंता का विषय बन गई है जो इन दस्तावेजों को पहचान के रूप में उपयोग करते हैं, लेकिन नागरिकता साबित करने के लिए अन्य दस्तावेज जमा करने में असमर्थ हैं।
नागरिकता और मताधिकार के बीच के रिश्ते पर नई बहस छेड़ दी
बिहार में चल रही एसआईआर प्रक्रिया ने मतदाता सूची को अपडेट करने के साथ-साथ नागरिकता और मताधिकार के बीच के रिश्ते पर नई बहस छेड़ दी है। चुनाव आयोग का कहना है कि यह प्रक्रिया संवैधानिक और कानूनी ढांचे के तहत है, और इसका उद्देश्य केवल मतदाता सूची को शुद्ध करना है। हालांकि, विपक्ष और कुछ कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रक्रिया को और पारदर्शी और समावेशी बनाने की जरूरत है ताकि किसी भी व्यक्ति का मताधिकार अनावश्यक रूप से प्रभावित न हो। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई इस विवाद को और स्पष्ट कर सकती है।



